➤ किशाऊ परियोजना पर छह राज्यों के बीच आज होगा MoU
➤ हिमाचल को बिना निवेश 211 मेगावाट मुफ्त बिजली और 600 करोड़ सालाना आय का अनुमान
➤ 17 साल से अटके 660 मेगावाट प्रोजेक्ट को अब मिली आगे बढ़ने की राह
शिमला। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को लेकर 17 साल से चली आ रही अड़चनों के बाद अब बड़ा रास्ता साफ होता दिखाई दे रहा है। मंगलवार को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के बीच इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं। हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू भी समझौता समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंच चुके हैं। इस समझौते के बाद पानी के बंटवारे, परियोजना की लागत और राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर लंबे समय से चली आ रही खींचतान खत्म होने तथा परियोजना के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है।
हिमाचल की शर्त पर बनी राज्यों के बीच सहमति
किशाऊ परियोजना को लेकर हुए समझौते में हिमाचल प्रदेश के हितों को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था की गई है। इसके तहत हिमाचल के हिस्से के पानी को दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराया जाएगा। इसके बदले दिल्ली और राजस्थान हिमाचल के हिस्से के बिजली घटक की लागत वहन करेंगे।
इस व्यवस्था का सीधा अर्थ यह है कि हिमाचल अपने हिस्से के पानी का उपयोग दूसरे राज्यों के लिए होने देने के बदले परियोजना के बिजली घटक में आर्थिक लाभ प्राप्त करेगा। राज्य सरकार के अनुसार यह व्यवस्था हिमाचल के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश को परियोजना में अपनी ओर से बड़ा वित्तीय निवेश नहीं करना पड़ेगा, जबकि उसे बिजली उत्पादन में हिस्सा मिलेगा।
हिमाचल नहीं लगाएगा पैसा, 211 मेगावाट मुफ्त बिजली का दावा
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के अनुसार हिमाचल प्रदेश इस परियोजना पर पैसा खर्च नहीं करेगा। इसके बावजूद राज्य को किशाऊ परियोजना से 211 मेगावाट मुफ्त बिजली मिलने की उम्मीद है।
मुख्यमंत्री के मुताबिक इस बिजली से हिमाचल प्रदेश को करीब 600 करोड़ रुपये सालाना की आमदनी होने का अनुमान है। ऐसे में किशाऊ परियोजना को राज्य के लिए ऊर्जा और आर्थिक, दोनों दृष्टियों से अहम माना जा रहा है।
परियोजना से मिलने वाली बिजली हिमाचल की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक संसाधनों को मजबूत करने में मदद कर सकती है। खास बात यह है कि राज्य सरकार इसे बिना बड़े निवेश के मिलने वाले दीर्घकालिक लाभ के रूप में देख रही है।
90 फीसदी लागत केंद्र सरकार उठाएगा
किशाऊ परियोजना के वाटर कंपोनेंट को लेकर भी लागत साझा करने की व्यवस्था तय की गई है। इसके तहत परियोजना के वाटर कंपोनेंट की 90 फीसदी लागत केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि बाकी 10 फीसदी लागत छह राज्यों के बीच साझा की जाएगी।
लागत और पानी के बंटवारे को लेकर ही परियोजना लंबे समय से अटकी हुई थी। ऐसे में छह राज्यों के बीच बनी नई सहमति को परियोजना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
660 मेगावाट बिजली पैदा होगी
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है। टौंस यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है। परियोजना का क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और उत्तराखंड के देहरादून क्षेत्र की सीमा के पास आता है।
परियोजना की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 660 मेगावाट होगी। इसके लिए 165 मेगावाट क्षमता की चार इकाइयां स्थापित करने का प्रस्ताव है। परियोजना से सालाना करीब 1379 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान लगाया गया है।
इसके अलावा बांध के निर्माण से करीब 1324 मिलियन क्यूबिक मीटर लाइव जल भंडारण क्षमता विकसित होगी। यह जल भंडारण ऊपरी यमुना बेसिन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
करीब 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को मिलेगा सिंचाई लाभ
किशाऊ परियोजना का उद्देश्य केवल बिजली पैदा करना नहीं है। इसके जरिए बड़े क्षेत्र में सिंचाई और विभिन्न उपयोगों के लिए पानी उपलब्ध कराने की योजना है।
परियोजना से करीब 97,076 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए भी पानी उपलब्ध कराने की योजना है।
प्रस्तावित परियोजना के तहत करीब 236 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांध का निर्माण किया जाना है। इतने बड़े जलाशय के बनने से पानी के नियोजित भंडारण और वितरण की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित हुई थी
किशाऊ परियोजना कोई नई योजना नहीं है। इसे वर्ष 2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया था। इसके बावजूद करीब 17 साल तक परियोजना जमीन पर आगे नहीं बढ़ सकी।
पानी के बंटवारे, परियोजना की लागत किस राज्य को कितनी वहन करनी है और विभिन्न राज्यों के बीच सहमति जैसे मुद्दे इसके रास्ते में बड़ी बाधा बने रहे। यही कारण रहा कि राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने के बावजूद किशाऊ बांध का काम लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ पाया।
अब केंद्र सरकार की पहल के बाद छह राज्यों के बीच सहमति बनने से परियोजना को लेकर एक नया अध्याय शुरू होने की उम्मीद है।
जून की उच्चस्तरीय बैठक के बाद खुला MoU का रास्ता
किशाऊ परियोजना को लेकर जून 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक हुई थी। इस बैठक में छह राज्यों के बीच परियोजना को आगे बढ़ाने को लेकर सहमति बनी थी।
इसके बाद राज्यों के बीच समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ी और अब नई दिल्ली में MoU पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं। इस समझौते को परियोजना के लिए लंबे समय से चली आ रही अड़चनों को दूर करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
दिल्ली और राजस्थान को मिलेगा पानी, हिमाचल को बिजली का लाभ
किशाऊ परियोजना के तहत हिमाचल के हिस्से के पानी का उपयोग दिल्ली और राजस्थान की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा। इसके बदले हिमाचल को बिजली घटक में लाभ मिलेगा।
इस व्यवस्था से एक तरफ दिल्ली और राजस्थान को अतिरिक्त जल उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी, वहीं हिमाचल को बिजली के रूप में दीर्घकालिक आर्थिक लाभ मिलने की संभावना है। यही वजह है कि परियोजना को छह राज्यों के बीच जल और ऊर्जा संसाधनों के साझा उपयोग की बड़ी योजना के तौर पर देखा जा रहा है।
यमुना के पुनर्जीवन में भी मदद का दावा
किशाऊ परियोजना का एक बड़ा उद्देश्य ऊपरी यमुना बेसिन में जल भंडारण बढ़ाना भी है। इसके जरिए सिंचाई और पेयजल के साथ यमुना में स्वच्छ पानी का प्रवाह बढ़ाने की योजना है।
केंद्र के अनुसार परियोजना से यमुना के पुनर्जीवन की दिशा में भी मदद मिल सकती है। जल भंडारण क्षमता बढ़ने से विभिन्न राज्यों को जरूरत के अनुसार पानी उपलब्ध कराने और नदी के प्रवाह को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने में सहायता मिलने की उम्मीद है।
अब निर्माण प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद
MoU पर हस्ताक्षर के बाद सबसे बड़ा सवाल परियोजना के निर्माण की गति को लेकर है। करीब 17 वर्षों से अटके इस प्रोजेक्ट के लिए अब राज्यों के बीच मूलभूत सहमति बन गई है। ऐसे में आगे की औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद निर्माण गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद है।
हिमाचल प्रदेश के लिए यह परियोजना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य को बिना परियोजना में निवेश किए 211 मेगावाट मुफ्त बिजली मिलने का दावा किया जा रहा है। इसके अलावा करीब 600 करोड़ रुपये सालाना आय का अनुमान भी राज्य के आर्थिक हितों को मजबूत करने वाला पहलू है।
वहीं, परियोजना के पूरा होने पर दिल्ली, राजस्थान और अन्य ऊपरी यमुना बेसिन के राज्यों को पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक उपयोग के लिए अतिरिक्त पानी उपलब्ध होने की संभावना है। 660 मेगावाट बिजली उत्पादन, 1324 एमसीएम लाइव स्टोरेज और करीब 97 हजार हेक्टेयर सिंचाई क्षमता वाली यह परियोजना अब 17 साल के इंतजार के बाद एक बार फिर निर्माण की दिशा में आगे बढ़ती नजर आ रही है।



